सुफ़यान सैफ़ | विशेष लेख

आज हमारा समाज दहेज जैसी सामाजिक बुराई से जूझ रहा है। हर घर, हर मोहल्ले में कोई न कोई परिवार इस समस्या से प्रभावित है। दहेज के ख़िलाफ़ आवाज़ें उठती हैं, क़ानून बनाए जाते हैं, पंचायतें होती हैं, लेकिन असल सवाल अब भी कायम है — दहेज की जड़ कहाँ है?
हाल ही में 25 जनवरी 2026 को उटावड़ मरकज़ में आयोजित सामाजिक पंचायत इसी दिशा में उठाया गया एक बेहद सराहनीय और उम्मीद जगाने वाला क़दम है। समाज की गहराती बुराइयों पर खुलकर चर्चा करना और समाधान की राह तलाशना अपने-आप में एक सकारात्मक पहल है, जो समर्थन और प्रशंसा दोनों की हक़दार है। ऐसी कोशिशें यह पैग़ाम देती हैं कि अगर समाज संगठित होकर सोचे, तो बदलाव नामुमकिन नहीं।
अगर गहराई से विचार किया जाए, तो साफ़ नज़र आता है कि दहेज की सबसे बड़ी वजह बहनों और बेटियों को उनका जायज़ हक़ न मिलना है। जब एक बेटी को बचपन से यह सिखाया जाता है कि “तुम्हें तो पराया धन होना है”, जब उसे पिता की जायदाद और मीरास से दूर रखा जाता है, तो शादी के वक़्त वही बेटी मजबूरी में दहेज का बोझ उठाने पर विवश हो जाती है।
हक़ीक़त यह है कि अगर हम अपनी बहनों और बेटियों को उनका पूरा मीरास (विरासत) हक़ ईमानदारी से दे दें, तो दहेज अपने-आप कमजोर पड़ने लगेगा। आर्थिक रूप से मज़बूत और आत्मनिर्भर बेटी न तो दहेज देने के दबाव में आएगी और न ही किसी तरह के शोषण को चुपचाप सहन करेगी।
आज ज़रूरत इस बात की है कि दहेज को सिर्फ़ एक सामाजिक रस्म मानकर न देखा जाए, बल्कि इसके पीछे छुपी नाइंसाफ़ी को पहचाना जाए। मीरास देना एहसान नहीं, बल्कि फ़र्ज़ है। जिस दिन समाज यह फ़र्ज़ निभाने लगेगा, उसी दिन दहेज जैसी बुराइयों की जड़ें अपने-आप हिलने लगेंगी।
दहेज का विरोध भाषणों और नारों से नहीं, बल्कि अमल से होगा। अपनी बहनों और बेटियों को बराबरी का हक़ देकर ही हम एक इंसाफ़पसंद, मज़बूत और सभ्य समाज की बुनियाद रख सकते हैं।
नोट : लेखक की राय से आप का इत्तेफ़ाक़ ज़रूरी नहीं।
